मंगलवार 29 सितंबर 2026 - 17:35
लखनऊ में फख़रुल-उलेमा मौलाना मिर्ज़ा मुहम्मद आलम की बरसी पर मजलिस ए तरहीम

दरगाह-ए-हज़रत अब्बास (अ), रस्तम नगर में फख़रुल-उलेमा मौलाना मिर्ज़ा मुहम्मद आलम की बरसी के अवसर पर मजलिस-ए-तरहीम आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में मोमिनीन, उलेमा, खतीब, वाइज़ीन, ज़ाकिरीन, छात्र और शहर के सम्मानित लोगों ने भाग लिया। मजलिस को मौलाना मिर्ज़ा एजाज़ अतहर ने संबोधित किया और दिवंगत की इल्मी व दीनी सेवाओं तथा उलेमा की जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ/ दरगाह-ए-हज़रत अब्बास (अ), रस्तम नगर, लखनऊ में फख़रुल-उलेमा मौलाना मिर्ज़ा मुहम्मद आलम की बरसी के अवसर पर मजलिस-ए-तरहीम का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में मोमिनीन, सम्मानित छात्र, उलेमा-ए-किराम, खतीब, वाइज़ीन, ज़ाकिरीन और शहर के सम्मानित लोगों ने भाग लिया। मजलिस को मौलाना मिर्ज़ा एजाज़ अतहर ने संबोधित किया और दिवंगत की इल्मी व दीनी सेवाओं को श्रद्धांजलि पेश करते हुए समाज में उलेमा की भूमिका और दीनी सेवा के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

अपने संबोधन में मौलाना मिर्ज़ा एजाज़ अतहर ने फख़रुल-उलेमा मौलाना मिर्ज़ा मुहम्मद आलम की इल्मी, दीनी और धार्मिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उलेमा और फुक़हा का जीवन धर्म के प्रचार-प्रसार, मिल्लत के मार्गदर्शन और नई पीढ़ी की दीनी व नैतिक تربियत के लिए समर्पित होता है। उन्होंने कहा कि किसी आलिम-ए-दीन की वास्तविक विरासत उसका ज्ञान, उसकी दीनी समझ और कौम व मिल्लत के प्रति उसकी संवेदनशीलता होती है, जो उसके बाद भी लोगों के मार्गदर्शन का माध्यम बनी रहती है।

उन्होंने मौलाना मिर्ज़ा मुहम्मद आलम की सेवाओं को याद करते हुए उनकी दीनी संघर्ष, इल्मी स्थान और धार्मिक समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे विद्वानों का जीवन और उनकी सेवाएं नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक होती हैं और उनकी इल्मी व दीनी विरासत को सुरक्षित रखना मिल्लत की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

मौलाना मिर्ज़ा एजाज़ अतहर ने अपने संबोधन में वर्तमान दौर में उलेमा की जिम्मेदारियों पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि उलेमा का कर्तव्य केवल दीनी मसले बयान करना नहीं है, बल्कि समाज में दीनी जागरूकता पैदा करना, युवा पीढ़ी को कुरआन और शिक्षाओं-ए-अहलेबैत (अ) से जोड़े रखना, नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना और उम्मत के बीच एकता व भाईचारे को मजबूत करना भी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दीनी मजलिसें और इल्मी बैठकें धार्मिक जागरूकता पैदा करने और नई पीढ़ी की تربियत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मजलिस के आरंभ और समापन के अवसर पर हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन मौलाना मिर्ज़ा जाफ़र अब्बास और मौलाना रज़ा अब्बास ने सभा में आए लोगों का स्वागत किया और उनकी उपस्थिति के लिए दिल से आभार व्यक्त किया। उन्होंने मजलिस में शामिल होने वाले उलेमा-ए-किराम, खतीब, वाइज़ीन, ज़ाकिरीन, छात्रों और मोमिनीन का धन्यवाद करते हुए कहा कि फख़रुल-उलेमा की बरसी के अवसर पर आयोजित इस मजलिस में ईमान वालों की बड़ी संख्या में भागीदारी दिवंगत की इल्मी व दीनी सेवाओं से उनके जुड़ाव का प्रमाण है।

मजलिस में शहर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मोमिनीन, सम्मानित छात्र, उलेमा-ए-किराम, खतीब, वाइज़ीन, ज़ाकिरीन और शहर के सम्मानित लोगों ने भाग लिया। मजलिस के अंत में दिवंगत के लिए ईसाल-ए-सवाब, बुलंदी-ए-दरजात और मग़फिरत की दुआ की गई।

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